गीत
खिल उठा यौवन कनक-सी देह पर
रूप की मदिरा छलक बहती रही
नैन में छलके समंदर की लहर
और पलकों पर खुमारी का कहर
मस्त अधरों पर उषः की लालिमा
भाल पर बिंदी उदित ज्यों पूर्णिमा
सुप्त भावों को जगाने के लिए
रूप की मदिरा छलक बहती रही
खिल उठा यौवन कनक-सी देह पर
रूप की मदिरा छलक बहती रही
शंख-सी ग्रीवा भुजाएँ हैं कमल
वक्ष पर यौवन झलकता है प्रबल
स्वर्ण के दो कुंभ ज्यों उर पर धरे
रूप के रस से छलकते हैं भरे
देवताओं को लुभाने के लिए
रूप की मदिरा छलक बहती रही
खिल उठा यौवन कनक-सी देह पर
रूप की मदिरा छलक बहती रही
क्षीण कटि पर मेखला झंकारती
काम-सी नाभि भंवर मनुहारती
मंद गजगामिनी सी जब वह चले
पायलें चरणों में ज्यों कविता ढलें
हर दिशा को मंत्रमुग्ध करने लिए
रूप की मदिरा छलक बहती रही
खिल उठा यौवन कनक-सी देह पर
रूप की मदिरा छलक बहती रही
अंग से उठती सुवासित गंध है
ज्यों मलय मारुत का कोई छंद है
केश सावन की घटाओं से सघन
चूमते हैं पीठ को ज्यों हों मगन
प्रेम की तृष्णा जगाने के लिए
रूप की मदिरा छलक बहती रही
खिल उठा यौवन कनक-सी देह पर
रूप की मदिरा छलक बहती रही
-भानु शर्मा रंज