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राधिका के नैन में घनश्याम झलकैं हैं

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                            राधिका के नैन में घनश्याम झलकैं हैं
        
                                                    
                            
बाँसुरी की तान पे सब प्रान छलकें हैं

बावरी भईं गोपियाँ, सुध-बुध बिसारी है
प्रेम की यह रीत जग में, सब तें न्यारी है
कालिंदी के कूल पे छैयाँ कदंबन की
थाम लीन्हीं राधिका की, साँवरे बैंयाँ
नेह के रस-रंग में भीगीं ये पलकें हैं
बाँसुरी की तान पे सब प्रान छलकें हैं
राधिका के नैन में घनश्याम झलकैं हैं

मोर की पखियाँ मुकुट पे, खूब सोहैं आज
छीन लीन्हों साँवरे ने, सब हिया को राज
धूलि गोकुल की भाल पे, चन्दन सी राजै
नैन-कोरन में मिलन की, आरती साजै
प्रेम-मदिरा पी सखी सब, आज बहकैं हैं
बाँसुरी की तान पे सब प्रान छलकें हैं
राधिका के नैन में घनश्याम झलकैं हैं

रास की यह रैन मानों, युग-युगांतर सी
देवता भी जोहते छबि, यह निरन्तर ही
रास-मण्डल में रची है, प्रीति की माया
मध्य माधव, संग गोपिन की छटा-छाया
चाह में श्री कृष्ण की पायल ये खनकैं हैं
बाँसुरी की तान पे सब प्रान छलकें हैं
राधिका के नैन में घनश्याम झलकैं हैं

देहरी, पनघट, गली सब, हो गईं पावन
श्याम रस बरसत है जैसे, मास हो सावन
बिसरि गई सगरी सुधें, संसार की बातें
चित्त में बस गईं जमुना-तीर की रातें
रोम-रोमन में मिलन की, आँच लहकैं हैं
बाँसुरी की तान पे सब प्रान छलकें हैं
राधिका के नैन में घनश्याम झलकैं हैं
-भानु शर्मा रंज
 
3 महीने पहले
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