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नैन के दीपक जले हैं दरस की ही आस में

Anonymous User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब पुकारै प्रीत मोरी लौट अइयौ कान्ह
        
                                                    
                            
नैन के दीपक जले हैं दरस की ही आस में

डाल पे कदंब की जब झूलते इक साथ
हाथ में छलिया दियो जो बाँवरी को हाथ
यमुना के तीरे सुहानी वो मिलन की ठौर
भूल कैसें जाय राधा साँवरे की बौर
प्रीत की हर एक कसौटी पे खरी थी श्याम
आँसुअन की धार बहती दरस की ही आस में

जल रही है आजहूँ ये नेह की ही जोत
विरह में तप तप भयो है कंचन सो अकार
काल की आँधी चलै या जग करै परिहास
छूट ना पावै कभू यों साँवरे को रास
नैन ये पथरा गए हैं जोहते ब्रज पंथ
सांस भी अब चल रही है दरस की ही आस में

बाँसुरी की तान में अब पीर बाजे मीत
विरह की पीड़ा बनै अब राधिका को गीत
प्रेम की पोथी अधूरी रह गई ब्रज धाम
रोम रोम पुकारत है साँवरे को नाम
पीर का यह ग्रन्थ बांचो हे मेरे घनश्याम
प्राण भी अब अड़ गए हैं दरस की ही आस में

-भानु शर्मा रंज
 
3 महीने पहले
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