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मतलब का बाजार खड़ा

Anonymous User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रंग बदलते चेहरे देखे
        
                                                    
                            
मतलब का बाजार खड़ा
कदम कदम पर धोखा छलता
हर नुक्कड़ मक्कार खड़ा
मखमल जैसी मीठी बातें
मन में विष का सागर है
कौड़ी कौड़ी पर बिकता जो
वही आज का ईश्वर है
फिर भी उसको पूजने वाले
लेकर यहाँ कतार खड़ा

कागज़ के फूलों में भँवरे
अब तो रस को खोज रहे
भीतर भीतर मरे हुए सब
बाहर जीवन बोध रहे
प्यास बुझाने वाले बादल
आग लगा कर लौट गए
साया देने वाले तरुवर
काँटे चुभा कर लौट गए
छाँव माँगने जो भी आया
धूप का वो हकदार खड़ा

सत्य यहाँ पर भीख माँगता
झूठ पहन कर ताज चला
न्याय खड़ा है नंगा देखो
पाप का कुत्सित राज चला
कलम बिकी है सियासतों में
शब्दों के व्यापार हुए
सृजन सिसकता है कोनों में
गीत सभी बीमार हुए
पीड़ाओं की वसीयत लेकर
अब तो हर फनकार खड़ा



बस्ती बस्ती आग लगी है
पत्थर के सब भवन बने
नदियों का जल सूख रहा है
स्वार्थ के जंगल सघन बने
सोने की जंजीरें पहने
आज़ादी खुद रोती है
लालच की अंधी गलियों में
इंसानियत अब सोती है
आँखों में आँसू के दरिया
लेकर हर किरदार खड़ा

राख हुए अरमान यहाँ पर
मंज़िल का कुछ भान नहीं
रहनुमाई करने वाले
का कोई ईमान नहीं
भीड़ बहुत है पर जीवन में
हर मानव एकाकी है
टूटे फूटे इन खंडहर में
बस थोड़ी सी जान बाकी है
मौत और जीवन के तट पर
आज आदमी हार खड़ा
-भानु शर्मा रंज
 
2 महीने पहले
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