लगी नेह की आज ऐसी खुमारी
मोहे साँवरी रूप-माधुरि सुहाई
छिपौ है कन्हाई कदम की छैयाँ
मेरी सुध-बुध आज पीया नें चुराई
नयन में बसै ज्यों कजरवा की डोरी
मैं छिप-छिप के मोहन कौ मुखड़ौ निहारूँ
कहैं सास-ननदी ये कैसी ठिठोली
मैं मोहन पे सब लोक-लाजन कौं वारूँ
जभी तान बंसी की कानन में गूँजै
तो नस-नस में मीठी सुधा सी समाई
लगी नेह की
मुकुट मोर-पंखी छटा सीस राजै
मैं चरनन की धूरि माथे पे राखूँ
हँसैं गोपि-ग्वालन करैं सब मज़ाकौ
मैं बस नाम गिरधर कौ निशदिन ही भाखूँ
मुरझायौ सौ मन जब दरस इनकौ पावै
तो मानौं बिरज में बसंती रुत आई
लगी नेह की
कहै 'रंज' जग की ये रीतें हैं फीकी,
मैं कान्हा की बंसी ते प्रानन कौं जोरूँ
नही चीर कछु लाज कौ अब बचौ है
मैं दुनिया के सब झूठे बंधन कौ तोरूँ
सखी बावरी ह्वै गई मैं तो पूरी
ये कैसी लगन मोरे हिरदै लगाई
लगी नेह की
-भानु शर्मा रंज