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कर्म-तपस्या (भाग - 1)

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पीड़ा की भट्टी में जब तक,
        
                                                    
                            
कोई भी पाषाण न जलता।
छैनी और हथौड़ी के बिन,
मूरत में भगवान न ढलता।

सीप न जब तक वक्ष चीरती,
मोती का आकार कहाँ है?
तपे बिना इस कर्मभूमि में,
बोलो जय-जयकार कहाँ है?।।

बांसुरी के सीने में देखो,
छेद हुए तब राग छलकते।
चोट सहे जो निहाई की सौ,
उसी खड्ग के भाल दमकते।

सुख की सेज बिछाने वालों,
पौरुष का सत्कार कहाँ है?
तपे बिना इस कर्मभूमि में,
बोलो जय-जयकार कहाँ है?।।

कर्ण दान की वेदी पर चढ़,
अपने कवच उतार रहे हैं।
देवराज के छल के आगे,
स्वयं हार स्वीकार रहे हैं।

ऋषि दधीचि की अस्थि बिना तो,
वज्रों में प्रहार कहाँ है?
तपे बिना इस कर्मभूमि में,
बोलो जय-जयकार कहाँ है?।।

अमृत की अभिलाषा में सब,
देव खड़े थे कतार लगाये।
नीलकंठ ने सृष्टि बचाने,
विष के प्याले होंठ लगाए।

बिना हलाहल पिये जगत में,
शिव का भी तो द्वार कहाँ है?
तपे बिना इस कर्मभूमि में,
बोलो जय-जयकार कहाँ है?।।



राजमुकुट की छाँव त्यागकर,
वन-वन भटके वीर प्रतापी।
घास-फूस की रोटी खाकर,
रखी स्वाधीनता की थाती।

कष्टों की वेदी के बाहर,
स्वाभिमान का सार कहाँ है?
तपे बिना इस कर्मभूमि में,
बोलो जय-जयकार कहाँ है?।।

राजवंश के एक दीप को,
पन्ना धाय बचाने आई।
निज सुत की बलि चढ़ा दी हँसकर,
ऐसी भी क्या निष्ठुर माई।
रक्त रंगे उस पालने सा,
कोई भी उपकार कहाँ है?
तपे बिना इस कर्मभूमि में,
बोलो जय-जयकार कहाँ है?।।

तुझे अकेले खेनी होगी,
अपनी नाव भँवर के अंदर।
कोई पार नहीं उतारेगा,
स्वयं लांघना है समंदर।

खुद को खुद पहचान न पाये,
तो फिर ये संसार कहाँ है?
तपे बिना इस कर्मभूमि में,
बोलो जय-जयकार कहाँ है?।।

 
2 महीने पहले
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