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कभी मेघ बनकर जो यादें घिरेंगी

Anonymous User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी मेघ बनकर जो यादें घिरेंगी
        
                                                    
                            
बुझी प्यास नयनों की फिर से जगेगी
अधर मौन के जब फड़कने लगेंगे
दिशाएँ मेरा नाम जपने लगेंगी
भले तुम भुला दो वो कसमें हमारी
ये धड़कन तुम्हारी बगावत करेगी
कभी मेघ बनकर जो यादें घिरेंगी

चले जाओ तुम चाहे जितनी भी दूरी
रहेगी मगर प्रेम-तृष्णा अधूरी
कभी आइने से जो नज़रें मिलाओ
छवि बस मेरी ही उभरने लगेगी
नयी बस्तियों में भले घर बना लो
तुम्हारी डगर मेरी आहट सुनेगी
कभी मेघ बनकर जो यादें घिरेंगी

तुम्हें मान बैठा हूँ मैं इष्ट अपना
हृदय के शिवालय में मूरत सजी है
तुम्हारी ही पूजा है मेरा धरम अब
लबों पर तुम्हारी ही आयत जड़ी है
कभी आरती की जो बेला सजेगी
तुम्हारी ही मूरत वहाँ पर हँसेगी
कभी मेघ बनकर जो यादें घिरेंगी

अकेली जो लहरें तड़पती हैं तट पर
उन्हें भी समंदर से मिलना पड़ेगा
तपन जो विरह की जलाती है मन को
मिलन की घटा एक दिन तो घिरेगी
कहे रंज ये प्रेम शाश्वत हमारा
ये रचना युगों तक अमर ही रहेगी
कभी मेघ बनकर जो यादें घिरेंगी
-भानु शर्मा रंज
 
3 महीने पहले
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