गीत
घिरि घिरि आए सघन बदरिया नभ पर दामिनि दमक रही
पै पीतम बिनु या सावन में हियरे बिरहा दहक रही
तुम सजल मेघ गोकुल वन के मैं तपत भूमि बिरजावलि की
जब रीत गई सब सुधि बुधि ही गति सूझत नाहीं बावरि की
छुटि गयो साथ जब अँचरा को फिर रैन बसेरो कहाँ सखी
इन उमड़त घुमड़त बदरन में यह प्रान उबारो कहाँ सखी
घिरि घिरि आए सघन बदरिया
नहिं मेंहदी रचत हथेलिन पै महावर लागत ज्यों छाले
यह कँगना डसत है नागिनि ज्यों गजरे में बिच्छू छिपि घाले
पी पी की टेर सुनत सखिरी लागत है जियरे में बरछी
झूलन की डोरी फाँसी सी पुरवैया लागत है तिरछी
मोरे नैनन सावन भादों है नभ बरसत करत ठिठोली है
उड़ि गयो रंग सब सपनन को आँसुन सो भीगी चोली है
जब टूटि गई डोरी उर की फिर प्रान पखेरु कहाँ सखी
इन उमड़त घुमड़त बदरन में यह प्रान उबारो कहाँ सखी
घिरि घिरि आए सघन बदरिया
नदिया तो उमड़ि उमड़ि बहती मोरे हियरे मरुथल की प्यास
बादल में बिजुरी दमक रही मोरे जीवन में तिमिर उदास
मैं नीर भरी दुख की बदरी तुम चंचल नदिया की धारा
तुम पार गए निर्मोही बन मैं तकत रह गई किनारा
ज्यों दादुर मोर मलार गात त्यों बिरहा मोरा डोलत है
यह कारी रैन डरावत है विष बिरहा को मन घोलत है
जब सूनी भई सेजरिया ही फिर सपन सुहावन कहाँ सखी
इन उमड़त घुमड़त बदरन में यह प्रान उबारो कहाँ सखी
घिरि घिरि आए सघन बदरिया
मैं पीर पिरोई माला हूँ तुम निर्मोही की मूरत हो
मैं रैन जगी इक अँखियाँ हूँ तुम भोर भई की सूरत हो
इतनो ना दानी है सावन जो जनम जनम की प्यास हरै
इतनी ना भावुक यह दुनिया जो बिरहिन की कछु आस करै
जब दरद न बाँच्यो पीतम ने तो नेह नगर को काह करूँ
जब साँस बनी है अँगियारी तो सूने घर को काह करूँ
जब रास रचै ना साँवरियो फिर मधुबन भावन कहाँ सखी
इन उमड़त घुमड़त बदरन में यह प्रान उबारो कहाँ सखी
घिरि घिरि आए सघन बदरिया
-भानु शर्मा रंज