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देखतौ दरपन लजायौ ही रह्यौ

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                            अंग की द्युति निरखि कैं नव बाल की
        
                                                    
                            
देखतौ दरपन लजायौ ही रह्यौ

मुख मयंकहिं देखि कैं ससि छिपि गयौ
बादरन में लाज कैं वह धँसि गयौ
अधर बिद्रुम से अरुण रस पूर हैं
मुसुकनी पै कोटि रति भी चूर हैं
छबि निरखि मकरंद सी उस भाल की
देखतौ दरपन लजायौ ही रह्यौ
अंग की द्युति निरखि कैं नव बाल की
देखतौ दरपन लजायौ ही रह्यौ

सघन कुंतल नील जलधर की घटा
चमकती चपला मनौ तन की छटा
ग्रीव कम्बु सुडौल बाँहें बेल सी
अंगुरी कोमल कमल की केल सी
लहरती सी नागिनी हर बाल की
देखतौ दरपन लजायौ ही रह्यौ

अंग की द्युति निरखि कैं नव बाल की
देखतौ दरपन लजायौ ही रह्यौ
छरहरी सी कटि लचै ज्यों दामिनी
चाल मतवारी चलै गज गामिनी
चरन पंकज माहुरी सों रंजि गए
भौंर रसिया रूप रस में मज्जि गए
महकती सी बास चम्पक डाल की
देखतौ दरपन लजायौ ही रह्यौ
अंग की द्युति निरखि कैं नव बाल की
देखतौ दरपन लजायौ ही रह्यौ

नवल जोबन बावरी सी भई कली
छोड़ि कैं बचपन सयानी हो चली
फूल की मृदुता चुराई देह ने
साँस कूँ चंदन कियौ है नेह ने
बज उठीं रून झुन मनौ सुर ताल की
देखतौ दरपन लजायौ ही रह्यौ
अंग की द्युति निरखि कैं नव बाल की
देखतौ दरपन लजायौ ही रह्यौ
-भानु शर्मा रंज
 
2 महीने पहले
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