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ग़ज़ल

kamla sharmam

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            
गुलशन भी वीराने निकले
सच सारे अफ़साने निकले

शीशों की ना समझी देखो
पत्थर को समझाने निकले

ज़ख़्मों का मजमा था दिल में
कांटे ही सहलाने निकले

सदियों के प्यासे सहरा को
बादल ये समझाने निकले

टूटे फूटे घर के अन्दर
पक्के सब तहखाने निकले

चोरी चोरी दिल को चुराया
अब दिल को लौटाने निकले
2 वर्ष पहले
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