मेरी तस्वीर मुझे ताक रही है
मेरे चेहरे को भाप रही है
लफ़्ज़ ख़ामोश खड़े हैं
एक पहर की धूप
कमरे में बंद पड़ी है
निष्प्रभ हुई कविता
अपने मक़सद से
टूट कर इधर-उधर पड़ी है।
- कामिनी मोहन पाण्डेय