बोल तो खूब सकते हो,
बात दूसरों की सुनते हो?
अपने दर्द को कह लेते हो,
दूसरों का दर्द भी चुनते हो?
शब्दों से रिश्ता रखते हो,
खामोशी को भी पढ़ते हो?
अपनी आँखों में दर्द लिए,
दूसरों के आँसू गिनते हो?
बोलना तो सबको आता है,
सुनना इतना आसान नहीं,
वर्षों लगते हैं सीखने में इसे,
यह कोई हुनर आम नहीं।
— कमल किशोर झा