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दरवाज़ा

kamal jha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            छप्पर उड़ गया,
        
                                                    
                            
दीवारें ढह गई
मलबे के बीच
बस दरवाज़ा बचा है—
शायद उसे मालूम है,
घर सिर्फ दीवारों से नहीं,
किसी के लौटने की
उम्मीद से भी बनता है।
वह अब भी खुला है—
किसी अपने के लिए,
जो लौटेगा कभी
और पूछेगा—
“मेरा घर कहाँ है?”

—कमल किशोर झा 
एक दिन पहले
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