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कोचिंग का बहाना, मूवी का ठिकाना

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                            २०१२ की वो दोस्ती, कोचिंग का था बस बहाना
        
                                                    
                            
गोची मारकर हॉल में घुसना, वो यारों का अफसाना

पहली घंटी बजते ही खिसकना, गलियों से बचते बचाते
टिकट खिड़की पर धड़कता दिल, वो चोरी का नजराना

इंटरवल में कचोरी की दुकान, टिफिन में घर का खाना
साथ में हँसी ठिठोली और, हर लम्हा बेगाना

फिर स्टेशन की तरफ दौड़ना, तीन बजे की ट्रेन पकड़ना
भागमभाग में सांस फूली, पर घर का था ठिकाना

सीट मिलते ही आँखें मूंदना, दिन भर की मस्ती का नशा
सपने में फिर वही सिनेमा, और यारों का वो गाना

घर पहुँचकर चुपके से सोना, डर भी था थोड़ा मन में
पर अगली गोची का इंतजार, वो मीठा सा तराना

वो 'असर' 2012 की यादें, दोस्ती और वो फिल्में
कोचिंग तो बस नाम था यारों, मकसद था बस घूम आना
एक वर्ष पहले
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