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तल्ख ए जुनू के सिपाही

Jugal Kishore

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रौशनी उठी दुआ थी किसी इकरार के लिए।
        
                                                    
                            
ज़ख़्म-ए-वक़्त जाना था किरदार के लिए।

सर-ए-सफ़र थी हिज्र की तारीखी यु़ मंज़िलें,
सिलते रहे तक़दीर की सुई से, दीदार के लिए।

क़ल्ब-ए-ख़राब उम्मीद बरक्स जम न सका,
हर सांस थी सद्र-ए-जुनूँ इनकार के लिए।

कूचा-ए-फ़ना में वजूद रक़्स करता रहा ताउम्र,
अनजानी चीख़ किसी सब्र के इज़हार के लिए।

महरूम-ए-वक़्त थे मगर दिल में शुहूद बाकी,
जज्बा हर आँच में जलते रहे इख़लास के लिए।

सुल्तान-ए-दर्द ने जब तक़दीर लिख डाली,
हमने कलम कबकी उठाई वकाऱ के लिए।

रौज़-ए-जज़ा की दहलीज़ पर भी साया न था,
बेवजह क़दम रखा गया इस्तिग़फ़ार के लिए।

ख़ुर्शीद-ए-दिल ने बुझा दी हसरतों की लौ,
अब रौशनी बाकी है बस इज़्तरार के लिए।

रंग-ए-वजूद में ख़ामोशी की तहज़ीब बसी,
खामोष लफ़्ज़ था मानो इक ऐतबार के लिए।

मर्ज़-ए-हयात का इलाज तर्क-ए-हवा में मिला,
हर दर्द था बस तस्लीम-ए-राजदार के लिए।

तख़्त-ए-जुनूँ पे बैठा वो दीवाना मुसाफ़िर,
क़िस्मत से लड़ पड़ा इख़्तियार के लिए।

रूह-ए-वक़्त ने कहा, “अब सफ़र मुकम्मल है”,
बहरहाल दिल ठहर न सका इज़हार के लिए।

मुतलक़-सुकून की चाह में मिट गए सब नक़्श,
हुकूमती मतबल रहा नाम एक अशआर के लिए।

लौटा न कोई भी उस पार से अब तक मगर,
रूक रूक जान गई थी किसी अस्रार के लिए।

फ़ितरत ने हुक्म दिया तल्ख कर इस आलम को,
शख़्स जी उठा रूठे तेवर इन्क़िसार के लिए।

और चाँद ने देखा कि फ़लक भी ख़ामोश है,
तारों ने रौशनी सजादीह इस्तिक़बाल के लिए।

गल” ने लिखा,मैं शहीद-ए-दिलोजान के लिए,
दर्द क़ुबूल है दे ठोकर निजामी बदकार के लिए।

 
10 महीने पहले
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