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पापा

Jayshankar Singh Baghel

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब बाप बनके देखा, तो हमने ऐसा पाया।
        
                                                    
                            
कि बाप क्या है होता, हमको समझ पे आया।।
खुशियों को अपने कैसे, वो खर्च करते हमपे।
अंधेरा छीन कैसे, उजाला भरते हमपे।।
कैसे हमारे अंदर, उन्माद को हैं भरते।
इस बात पे हम उनका, धन्यवाद दिल से करते।।

कंधे पे बैठ उनके, मेले को घूमते हम।
छुक- छुक, मिठाई, फुग्गा, पा करके झूमते हम।
पापा के साथ साइकल में, खेत घूमते हम।
कभी वो भी प्यार करते, कभी माथ चूमते हम।
कभी शाम को फिर उनके, गोदी में झूलते हम।
ये बात सोच करके, अब दिल से फूलते हम।

फिर शाम को वो अक्सर, बारह खड़ी पढ़ाते।
पहाड़ा कभी न बनता, तो आँख फिर दिखाते।
कभी दो चमाट दे के, इमला हमें सिखाते।
गिनती पढ़ाते हमको, गुणा भाग फिर बताते।
सोने के पहले हमको, किस्सा हमें सुनाते।
सोहर, बियाह, दोहा, फिर दोनों मिल के गाते।

उनका पहन के चप्पल, फिर गाँव नापते हम।
फिर चश्मा पहन के उनका, स्टाईल मारते हम।।
जब गलती करके आते, तो दूर भागते हम।
आँखें जभी दिखाते, थर थर से काँपते हम।
जब मिट्ठी टॉफी लाते, तो खूब नाचते हम।
और पापा जैसा बनना , अब आज चाहते हम।

कभी गम को हरने वाले, कभी तम को हरने वाले।
पापा हमारे प्यारे, जो मुझको गढ़ने वाले।।
मेरी खुशी की खातिर, वो कुछ भी करने वाले।
खुद बेच करके सपने, मेरी खुशियाँ भरने वाले।
खुद सह के सारे गम को, पर कुछ न कहने वाले।
किस्मत को मेरी सोने सा, खुद ही जड़ने वाले।

ऊपर से कुछ कठोर सा, अंदर से हैं मुलायम।
उस नारियल के जैसे, पापा हैं मेरे कायम।।
क्या मैं कभी भी ऐसा, कर पाऊँगा परिश्रम।
क्या उनके जैसे मैं भी, बन पाऊँगा सर्वोत्तम।
ये जिम्मेदारी मुझको, है लगती भारी भरकम।
मन टूट अब चुका है, कैसे करूंगा संयम।

पापा के जैसे मैं भी, बन पाऊँगा कभी क्या?
बेटे को अपने खुशियाँ, दे पाऊंगा कभी क्या?
क्या मैं भी ऐसा एक दिन, कर पाऊँगा कभी क्या?
परिवार साथ गंगा, नहाऊंगा कभी क्या?
मैं भी सुकून से क्या, सो पाऊंगा कभी क्या?
परिवार खातिर कुछ भी कर पाऊंगा कभी क्या?

पापा ने मेरी खातिर, अब तक भी जो किया है।
बेटे को अपने जो कुछ, माँगे बिना दिया है।
नियाँश मेरा बेटा, बेटी मेरी निया है।
अभी से उनका फ्यूचर, अब सोच सब लिया है।
अच्छा है सब अभी तक, आगे भी सब बढ़िया है।
जिएंगे ऐसे दोनों, कोई भी न जिया है।

मैं भी एक दिन फिर, अच्छा पिता बनूंगा।
बिन माँगे झोली उनकी, मैं भी सदा भरूंगा।
अच्छे बुरे समय में, मैं साथ में रहूंगा।
विष बाण उनके सारे, सीने में खुद सहूंगा।
मैं भी एक पिता हूँ, तब गर्व से कहूंगा।
पापा का नाम अपने, रोशन सदा करूंगा।

-जयशंकर सिंह बाघेल
 
10 महीने पहले
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