विज्ञापन

मैंने स्वप्न देखा

Jay Prakash

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            फिर से बरसी है कहीं, आज बरखा
        
                                                    
                            
मैंने खुली आँखों से, यह स्वप्न देखा।।

हवाओं से कदमताल मिलाती हुई
थोड़ी थमती, थोड़ी इठलाती हुई
उमीदों के नन्हें लहरों पर झूमती
चली जा रही वह कागद की नाव
उसमें बैठाए एक सवार अनोखा।।

फिर से बरसी है कहीं, आज बरखा
उसने खुली आँखों से, यह स्वप्न देखा।।

उसके हर हिचकोले में लरक उठे
मन उस सवार के डूब जाने का
याद तो होगा वो काला कलूटा
चींटा, जो राह ढूंढता कूद जाने का
पर बार बार उसे मैने घुमरते देखा।।

फिर से बरसी है कहीं, आज बरखा
हमने खुली आँखों से, यह स्वप्न देखा।।

यह भी किसी सरकारी बाबू सा
बस अपना धर्म निभा रहा शायद
जहाँ काम तो दिनभर होता रहता
बस परिणाम कही रहता नदारत
बस इस मेज उस मेज फाइल फेका।।

फिर से बरसी है कहीं, आज बरखा
सबने खुली आँखों से, यह स्वप्न देखा।।

अबकी सावन लाएगा शायद भरके
और बरसायेगा पश्चाताप के आंसू
जिसकी पवित्र धारा से यह धरती
लहलहाएगी खुशहाली के फसलों से
क्या अभी या कभी होगा ये अजूबा

फिर से बरसी है कहीं, आज बरखा
मैंने खुली आँखों से, यह स्वप्न देखा
-जयप्रकाश "जय बाबू"
4 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

RATAN KUMAR

771 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10784 कविताएं

View Profile