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आख़िर कब तक भागोगे?

Jainendra Gautam

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आख़िर कब तक भागोगे ?
        
                                                    
                            
जब तक साँसें ना रुकें ?
जब तक दिल ना थमे ?
जब तक पैर ना थके ?

या तब तक जब तक हम ना रहें ?
कहाँ जाओगे और किधर को ?
क्या कहोगे और किस-किस को ?

मैं वैसी नहीं हूँ जैसा तुम बुनते हो
पर वैसी भी तो नहीं जैसा सोचते हो

सब कुछ अलग़ है; जो हो तुम
जो दिखते हो, जो कहते हो
जो सोचते हो, सब कुछ
तुम्हारा कुछ भी तुम्हारे में नहीं

फ़िर भला मैं किस हिस्से से प्यार करूँ
और किन-किन हिस्सों से नहीं ?
करूँ सबसे या फ़िर किन्हीं से नहीं ?

कितना करूँ और क्यों करूँ
ये बात तो बाद की होगी
कब तक तुम मेरे हो
और कब तक मैं तेरी हूँगी
ये बात तो बाद की होगी

कब तक मैं पलकों से गालों को चूमूँगी
ये बात तो बाद की होगी
कब तक तुम मेरे लिए दुनियाँ समेटे रखोगे
ये बात तो बाद की होगी

क्या कभी बात होगी भी ?
क्या कभी मैं तुम्हें फ़िर अपना मानूँगी भी ?

सवालों और जवाबों से परे
रातों को मेरे तकिये के तले
आज़ भी हमारी यादें रखी हैं
पर हर बार की तरह
इस बार भी कोहरे की धुँध
और ठण्ड से बर्फ़ ज़मी पड़ी है

कभी नहीं या अभी हीं
कौन जाने कब क्या हो जाए
कभी नहीं या अभी हीं
किसका कौन हो जाए

पर उससे क्या..
ये ख़त्म हो जाएगी ?
पर उससे क्या..
तुम्हारी मुझसे मुझ तक की दौड़
ख़त्म हो जाएगी ? नहीं, कभी नहीं !
कभी भी नहीं !

तुम मेरे हो, रहोगे मेरे हीं
जीये बन के मेरे, मरोगे भी..हो के मेरे हीं

आख़िर कब तक भागोगे ?
जब तक साँसें ना रुकें ?
जब तक दिल ना थमे ?
जब तक पैर ना थके ?
- जैनेन्द्र गौतम "सम्राट"
एक वर्ष पहले
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