विज्ञापन

विधाता से विनय

Jagdish Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हे परमात्मा, कैसी तेरी माया न्यारी,
        
                                                    
                            
मनुष्य जन्म में भी विविधता कितनी सारी।
रंग-रूप अलग, अलग है बुद्धि सारी,
रुचि अलग, कला अलग, है रचना तुम्हारी।।

कौशल अलग, रक्त-समूह भी अलग-अलग,
तन की प्रकृति अलग, व्याधि का विधान अलग।
कोई ज्ञानी, कोई भोला, कोई चतुर सुजान,
तेरी ही लीला से है, यह सारा जहान।।

यजुर्वेद कहता - तू ही तो विधाता है,
तू ही रचता, तू ही सबका निर्माता है।
तेरी इच्छा सर्वोपरि, तेरा ही विधान,
तेरे बिन हिले न पत्ता, तू ही भगवान।।

पर वेद यही भी कहते, गहरा है रहस्य,
तेरी इच्छा का आधार, हमारे कर्म अवश्य।
तू देता फल कर्मों का, न्याय तेरा भारी,
जैसी करनी, वैसी भरनी, रीत यही जारी।।

और कर्म बनते हैं, पुरुषार्थ से भाई,
तप, स्वाध्याय, धर्म से, होती ऊँचाई।
ईश्वर-प्रणिधान से, जब मन जुड़ जाता है,
तभी तो जीव, शिव से मिल पाता है।।

तो हे प्रभु! हमें सद्गुणों से भर दो,
अवगुण सारे हर कर, निर्मल कर दो।
पुरुषार्थ दो, तप का तेज भी भर दो,
स्वाध्याय, धर्म, समर्पण से मन तर दो।।

ताकि कर्म हमारे, उत्तम, शुभ, श्रेष्ठ बनें,
तेरी प्रसन्नता के हम योग्य बनें।
तेरी कृपा का हम अधिकारी बनें,
और अंत में तेरी परम-ज्योति में समा सकें।।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
एक दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all