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ऋत की प्रार्थना

Jagdish Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            परमात्मा, वेद पुकारें — "सत्यं वद, धर्मं चर",
        
                                                    
                            
हे ऋत के स्वामी, जीवन की उलझन कैसे तर॥
कभी परिस्थिति घेरे, बुद्धि भ्रम में पड़े,
ऋत क्या, धर्म क्या, कर्तव्य क्या — अबोध मन न समझे॥

हे कृपासिंधु दयालु, हमें वो विवेक दो,
सत्य-असत्य की रेखा, स्पष्ट जो विवेक दो॥
ऋत-अनृत का भेद बता, अंधकार हर लो,
स्वधर्म-स्वकर्म का बोध करा, पथ पर स्थिर कर दो॥

यज्ञ, सेवा, स्वाध्याय की, राह हमें दिखा दो,
पंच यज्ञ की वेदी में, जीवन आहुत करवा दो॥
हे यज्ञपुरुष प्रभु, हृदय में अग्नि जला दो,
ताकि हर कर्म हमारा, तुम्हें समर्पित हो जाए॥

धृतिः क्षमा दमः का, अडिग बल प्रदान दो,
सत्य, तप, दया, करुणा का, तेज भी विधान दो॥
धर्मानुसार चलकर हम, परमानंद पा जाएँ,
तेरी शरण में आकर, जन्म सफल कर जाएँ॥

ॐ मेधां मे देवा ददातु, मेधा देवी सरस्वती,
मेधा अश्विनौ ददातां, मेधया स्पर्शे सर्वम्॥

- जगदीश प्रसाद शर्मा, दिल्ली 
14 घंटे पहले
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