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मनुस्मृति - धर्म का आईना

Jagdish Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सभ्यता की नींव पर, खड़ा दिव्य ग्रंथ है,
        
                                                    
                            
धर्म न्याय का, अडिग प्रकाश स्तंभ है।
वेदों की आत्मा को, जिसने रूप दिया,
महर्षि मनु ने, जग को वो ग्रंथ दिया।

ये नियमों की पोथी नहीं, जीवन विधान है,
मानव कल्याण का, सच्चा संविधान है।
सहस्रों वर्षों तक, भारत को चमकाया,
शांति समृद्धि का, दीपक जलाया।

नारी सम्मान का, ऊँचा मान यहीं है,
देवता वहीं बसते, जहाँ नारी पूज्य वहीं है।
"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता,"
यही मंत्र हमारा, यही सनातन देवता।

जहाँ स्त्रियाँ दुखीं, वह कुल नष्ट होता है,
जहाँ वे हँसतीं, वह कुल सदा बढ़ता है।
पुत्री को पुत्र सम, मनु ने बताया है,
माता को पिता से भी, ऊँचा बताया है।

यह ग्रंथ न बाँटता, यह तो जोड़ता है,
कर्तव्य सत्य अहिंसा, का पाठ पढ़ाता है।
राजा भी यहाँ, धर्म के अधीन है,
न्याय ही सबसे बड़ा, प्राचीन है।

आक्रमणकारी भी, देख इसे हारे थे,
इसकी एकता से, मन ही मन हारे थे।
आज संविधान है, लोकतंत्र की शान,
पर संस्कृति की जड़, मनुस्मृति महान।

इसकी शिक्षा अमर, परिवार बढ़ाती है,
नारी गौरव से, धरती महकाती है।
आओ मूल श्लोकों को, फिर से हम पढ़ें,
अपनी धरोहर पर, गर्व से सिर चढ़े।

यही तो भारत की, असली शक्ति है,
सनातन की धारा, यही तो भक्ति है।
 
एक महीने पहले
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