परम पिता, हे नाथ, अनादि अविनाशी,
जन्म-जन्मांतर से मैं भटकी, विविध देह की वासी॥
आपकी असीम कृपा से अब मानव तन पाया,
इस दुर्लभ देह को, हे प्रभु, सार्थक कर जाया॥
बीते जन्म-योनि का, कुछ ही स्मरण न आया,
कितने पाप किए मन-वचन-कर्म से, ये भी भान न पाया॥
अज्ञानी हूँ नाथ, जाने-अनजाने भटकी डगर,
तप-ताप-संताप से, मेरे पाप भस्म कर॥
प्रज्ञा दो, विवेक दो, तेज-बल संबल दो,
दृढ़ संकल्प की ज्योति जला, पथ पर अडिग कर दो॥
भटकते इस मन को, अपने नाम से बाँधो,
सात्विकता की लाठी दो, शुभ कर्मों तक साधो॥
हे दीनबंधु दयालु, जीवन व्यर्थ न जाने दो,
मेरे तन-मन को उज्ज्वल कर, सार्थकता प्रदान दो॥
भक्ति की माला पहना दो, मुक्ति का वरदान दो,
परम दिव्यता देकर, चिर विश्राम का स्थान दो॥
ॐ तेजोऽसि तेजो मयि धेहि, ज्योतिर्मय कर दीजो।
जन्म-मरण के बंधन से, हे प्रभु मुक्त कर दीजो॥
- जगदीश प्रसाद शर्मा, दिल्ली
स्वरचित मौलिक रचना