मैंने पूछा कलियों से
क्या अब तू खिल पायेगा..
मौसम तो अब पतझड़ का आया
तू कैसे खिल जायेगा..?
रूखी- सूखी हवा अब चलती
पत्ते तेरे गिर जाते है
तेरे मोटे तन के छाले
सूख सिकुड़ हो जाते है
डाली, टहनी,सूख टूट गिर
तने भी ठूँटे हो जाते है ;
पुष्पकली तू कैसे खिल अब जायेगा...?
वसुंधरा भी अपनी शोभा घटाती
इस पतझड़ के साये से,
सौंदर्य सा जो मुकुट धरा था
तृण पुष्प और काये से
हँसकर पूछा मैंने कलियों से
सच में क्या तू खिल पायेगा....?
रवि धूप भी कम हो जाती
तुझे तो कभी
कोहरा
ही सूखा दे जाता हैं
चमक चाँद की रौशनी भी
बादलों में कही छिप जाता हैं l
पुष्पकली तुम उपजे तो हो
लेकिन क्या अब खिल पायेगा...
मौसम तो पतझड़ का आया
तू कैसे अब
खिल जायेगा.........?
- हुमादास परतेती