हर साल जब पानी चढ़ता है,
कोई घर नहीं, ज़िंदगी बहती है।
छत से टपकती एक बूँद नहीं होती,
वो माँ की गोद से फिसलती बेटी की सांसें होती हैं।
कहीं मिट्टी में दबा होता है कोई ख्वाब,
कहीं बहती लाशें, भीगते आल्हा-छाब।
खेत नहीं डूबते जनाब,
वो पिता की आख़िरी उम्मीदें होती हैं जो बह जाती हैं चुपचाप ।
बच्चे पूछते हैं- "पापा, खाना कब मिलेगा?"
और बाप... बस मुँह फेर कर नदी में मुँह छुपा लेता है।
उसका जवाब नहीं होता, बस आँखों में एक सवाल होता है,
"क्या मैं फिर भी एक बाप कहलाऊँ?"
हर साल वही ताश के पत्ते जैसा वादा,
बाढ़ आती है, फिर आता है "साहबों" का जत्था।
हेलिकॉप्टर से उड़ते हुए उतरते हैं मंच पर,
हाथ में दो लीटर पानी और आँखों में नकली करुणा भर।
"हम साथ हैं" - ऐसा कहते हैं कैमरे के सामने,
जैसे उनकी आवाज से किसी माँ का मरा बच्चा लौट आएगा।
और जैसे ही लाइटें बुझती हैं,
फिर वो दर्द भी बैग में पैक हो जाता है।
गांव फिर गीले भूसे पर सोता है,
किस्मत फिर एक टूटी नाव में रोता है।
ना बिजली, ना खाना, ना आसरा,
बस भीगे हुए चूल्हे और भूखे पेटों का कारवां।
माँ अपने आँचल से आँसू नहीं पोंछती,
क्योंकि अब आँचल भी तो कीचड़ में डूब चुका है।
बच्चा पूछे- "माँ, ई बाढ़ कब जाई?"
और माँ बस छत की दरारों में भगवान को ढूंढती रह जाती है।
बिहार में बाढ़ अब कोई विपत्ति नहीं,
ये बन चुकी है एक राजनीतिक रस्म कहीं।
हर साल निभाते हैं ये 'तेहवार',
शब्दों में सहानुभूति, पर धरती पर शर्म का अभाव अपार ।
कभी-कभी लगता है,
हम ज़िंदा नहीं हैं- बस गिनती में हैं।
नक्शे में एक राज्य, अखबार में एक खबर,
जिसे पढ़कर लोग चाय पीते हुए कहते हैं- "ओह! फिर से बाढ़?"
कभी कोई नेता बिना कैमरे आया है?
कभी किसी ने बिना फोटो लिए खाना बांटा है?
कभी किसी अफ़सर ने कीचड़ में कदम रखा है?
या सिर्फ रबर की बूटों में धरती की पीड़ा को कुचला है?
हम मदद नहीं माँगते साहब,
बस इतनी सी बात कहते हैं--
एक बार इंसान बन कर देखिए,
फिर शायद समझ पाएंगे कि हर साल हम कैसे मरते हैं।