ये किस्सा है भारत के वीर बलिदानों का
कट गए हजारों सिर जब आज़ादी को पाने में,
सिर झुकाने से बेहतर समझे जो, सिर को कटाने में
उजड़ गए हजारों घर, इस चमन को सजाने में,
यूँ ही नहीं मिली ये आज़ादी हमें,
अपनी ज़िंदगी लुटा दी हमारे वीर जवानों ने
था जुनून सिर पर जिनका, देश को बचाने का,
ये किस्सा है भारत के वीर बलिदानों का।
जकड़ी भारत माता जब गुलामी की जंजीर में,
सिमट गई अन्नदाता जब बेड़ियों की तस्वीर में
बदल गया आकाश जब विवशता की लकीर में,
अलग हुई धारा जब नदियों के सलिल से,
हुआ जन्म तब वीर - शेर - बलवानों का,
ये किस्सा है भारत के वीर बलिदानों का।
चल दिए कफ़न बाँध जो, देश की परवाह कर,
लग गए लहू के तिलक जिनके ललाट पर।
सब्र कर ली माँ ने आँसुओं की बरसात कर,
स्त्रियों ने अपने सिंदूर दिए, धरा की एक गुहार पर
सँवार कर करोड़ों भविष्य, स्वयं भाग हुए इतिहासों का
ये किस्सा है भारत के वीर बलिदानों का।
हुए जुदा अपने लोग ही, खड़ी हुई विभाजन की एक दीवार,
सदियों से साथ थे जो, हुए अब वे भारत और पाकिस्तान
मंज़िल हुई तय तब, चाहे कश्मकश हो हजार,
गिरकर फिर खड़े हुए, नहीं माने हम कभी हार
बन गए मिसाल वीरता के उन दास्तानों का,
ये किस्सा है भारत के वीर बलिदानों का।