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(तिमिर में दीप जलते हैं)

Hari Mohan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तिमिर में दीप जलते हैं
        
                                                    
                            
इस उपवन में फूल खिलते हैं।

मिलेगी न शांति
होगी फिर क्रांति
मांगता है देश-
जब तक यह पावक शेष!

इस आपाधापी के
भ्रष्ट हाथों में संघर्ष पलते हैं,
तिमिर में दीप जलते हैं
इस उपवन में फूल खिलते हैं।

इन अधमों का तो क्या?
भारत ने वैश्वानर की ताप झेली है!
पर... क्यों भूलते हो?
क्यों झूलते हो?

यहां नारी की गोद में
राम कृष्ण पलते हैं
तिमिर में दीप जलते हैं
इस उपवन में फूल खिलते हैं।

कोई बने सुभाष- गांधी
देश में बहे एक आंधी!
उखड़ेंगे चमन के शूल
खिलेंगे उपवन में फूल

सीचो गर शोणित से
शूल भी गलते है
तिमिर में दीप जलते हैं
इस उपवन में फूल खिलते हैं।
-हरि मोहन जांगिड़
एक दिन पहले
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