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घाव जितने हैं भर सकें मिलकर

Gyaneshwar Anand

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दर्द में भी हर दिलों में प्यार रहे,
        
                                                    
                            
हर तरफ़ अम्नो ऐतबार रहे।

माँ की आँखों में है इंतज़ार,
लौट आए उसका दुलार रहे।

मलबे में जो दब गए हैं आज,
उनके हक़ में उठी गुहार रहे।

उजड़े घर फिर से बसें ऐसे,
हर तरफ़ फिर नई बहार रहे।

बच्चियों की हँसी लौट आए,
माँ के दिल में न अब गुबार रहे।

दूर हों दर्द की सभी रातें,
हर सुबह ज़िंदगी की बहार रहे।

जात-पात और सरहदें छोड़ें,
आदमी बस सभी का प्यार रहे।

घाव जितने हैं भर सकें मिलकर,
हर ज़ख़्म का यही उपचार रहे।

नेपाल फिर से मुस्कुरा उठे,
हर तरफ़ ज़िंदगी की पुकार रहे

‘ज्ञानेश’ बस यही दुआ है आज तो,
हर दुखी दिल में कुछ करार रहे।

 
एक महीने पहले
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