हौंसला दिल का जगाना चाहता हूँ!
गर्दिशों में मुस्कुराना चाहता हूँ!!
तीरगी को रौंदने का है इरादा!
बन के'जुगनू जगमगाना चाहता हूँ!!
बात रिश्तों की अगर हो ज़िंदगी में!
तो ख़ुशी से हार जाना चाहता हूँ!!
छेड़ दे जो तार सारे आज दिल के!
गीत ऐसा गुनगुनाना चाहता हूँ!!
ये धरा परिवार सारा मान कर मैं!
फ़ासले दिल से मिटाना चाहता हूँ!!
धड़कनें अब कर रही सरगोशियां हैं!
ज़िंदगी के सुर सजाना चाहता हूँ!!
इक मुसाफ़िर हूं सदाकत के सफर का!
उम्र भर चलते ही जाना चाहता हूं!
ज़िंदगी में मुस्कुराना चाहिए!
ज़िंदगी में मुस्कुराना चाहिए!
दिलनशीं नगमे सुनाना चाहिए!!
कामयाबी की तमन्ना है अगर!
हौंसला अपना बढ़ाना चाहिए!!
दूसरों को जो समझते कुछ नहीं!
आइना उनको दिखाना चाहिए!!
शायरी का फ़न कहाँ आसान है!
सीखने को इक ज़माना चाहिए!!
जब मुसाफ़िर हो अँधेरा हर तरफ़!
आस का सूरज उगाना चाहिए!!
तीरगी चीरने आज जुगनू चले!
पांडवों को प्रभु की दुआ मिल गई!
साथ उनकी निराली अदा मिल गई!!
तीरगी चीरने आज जुगनू चले!
रोशनी की उन्हें जो सदा मिल गई!!
भाव के पारख़ी हैं मे'रे ये नयन!
अब निगाहों में हमको हया मिल गई!!
इस कलम ने किया है अनोखा असर!
बिन कहे शारदे की दया मिल गई!!
हर घड़ी साथ मिलके रहा जो बशर!
बात उसकी सभी से जुदा मिल गई!!
रास्ता नेकियों का हमें क्या मिला!
दिलनशीं फ़िर मुसाफ़िर वफ़ा मिल गई!!
बुरे हर काम के देखो बुरे अंजाम होते हैं!!
दवा से जो नहीँ होते दुआ से काम होते हैं!
जहाँ में आज भी ऐसे करिश्मे आम होते हैं!!
गलत राहों से' जीवन में हमेशा दूर तुम रहना!
बुरे हर काम के देखो बुरे अंजाम होते हैं!!
निराला सा चलन देखा जहाँ में आज लोगों का!
बगल में हैं छुरी रखते जुबाँ पे राम होते हैं!!
दिलों में इस ज़माने के पनपती साज़िशें हरदम!
बशर की जान के तो बस ज़रा से दाम होते हैं!!
खुशी सारे ज़माने की भले मौजूद हो लेकिन!
नज़ारा लाख दिलकश हो मगर अच्छा नहीँ लगता!
रखे जो दूर छाया को शज़र अच्छा नहीँ लगता!!
खुशी सारे ज़माने की भले मौजूद हो लेकिन!
भरा ग़म है अगर दिल में बशर अच्छा नहीँ लगता!!
रहे अभिमान में अकड़ा हमेशा जो ज़माने में!
सिवा अपने कोई भी नामवर अच्छा नहीँ लगता!!
सियासत के दरिंदो की यही पहचान है होती!
बिना वोटों के कोई भी नगर अच्छा नहीं लगता!!
सदा आसान हों राहें नहीँ मुमकिन यहाँ हरगिज़!
गिले हों ज़िन्दगानी से सफर अच्छा नहीँ लगता!!
ज़माने को अगर देखो मुसाफ़िर की नज़र से तुम!
इरादों के बिना जीवन समर अच्छा नहीं लगता!
धर्मेन्द्र अरोड़ा मुसाफ़िर