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ऐसा नहीं कि मैं जीना नहीं चाहता

Gauri Shankar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ऐसा नहीं कि मैं जीना नहीं चाहता,
        
                                                    
                            
बस अब वो खुशियाँ कहीं खो सी गई हैं।
वो मेरा गाँव कहीं पीछे छूट सा गया है,
वहाँ के लोग अब थोड़े बदल से गए हैं।
पेड़ों में छाँव तो है, पर वो एहसास नहीं,
मैं फिर से वही पुराना जीवन चाहता हूँ...
.... ऐसा नहीं कि मैं जीना नहीं चाहता।
अब गलियाँ सुनसान सी हो गई हैं,
वो बाबा वाली चारपाई बेजान सी हो गई है।
अब चौपाल पर ढोल-मंजीरे नहीं बजते,
अब किसी के दरवाजे, वो पहले जैसे मेले नहीं लगते।
मैं ये सब फिर से देखना चाहता हूँ...
.... ऐसा नहीं कि मैं जीना नहीं चाहता।
वो मिट्टी में सने हाथ, वो गोली का निशाना,
वो हार-जीत पर दोस्तों का शोर मचाना।
जेब में अब वो कंचों की खनक नहीं मिलती,
चेहरे पर अब वो बेफिक्र चमक नहीं मिलती।
एक आँख बंद कर, मैं फिर अचूक निशाना चाहता हूँ...
.... ऐसा नहीं कि मैं जीना नहीं चाहता।
अब त्योहारों में वो हुड़दंग नहीं होता,
अब होली में अपनों वाला वो रंग नहीं होता।
दीवारें तो पक्की हो गई हैं मकानों की,
मगर अब कच्चे घरों सा वो 'संग' नहीं होता।
मैं फिर से वही अपनापन चाहता हूँ...
.... ऐसा नहीं कि मैं जीना नहीं चाहता।
वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी,
दादी के मुंह से सुनी, वो राजा-रानी की कहानी।
अब मोबाइल की दुनिया में सब सिमट से गए हैं,
वक्त नहीं है किसी के पास, सब बिखर से गए हैं।
मैं बस वो पुराना सुकून चाहता हूँ...
.... ऐसा नहीं कि मैं जीना नहीं चाहता।
7 महीने पहले
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