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लड़के जब पिता बनते हैं

Durgesh Jaiswal

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                            जब पिता बनते हैं
        
                                                    
                            
गली में घूमने वाले लड़के,
गली के नुक्कड़ पर खड़े होने वाले
और बैठकर चाय के नुक्कड़ पर
दुनिया की गप करने वाले लड़के।

जब पिता बनते हैं,
तो एक अरसे के बाद
कम हो जाती हैं ख़्वाहिशें,
आ जाती हैं ज़िम्मेदारियाँ।

होने लगती हैं क़ुर्बानियाँ
ख़ुद की ज़रूरतों और सपनों की,
अब उनकी भी एक नई दुनिया
बसने लगती है।

अब शामें दोस्तों के नाम नहीं,
घर के नाम होने लगती हैं,
जेब में पैसे कम हों तो भी
बच्चों की ख़्वाहिशें पूरी होने लगती हैं।

कल तक जो लड़का
बिना किसी फ़िक्र के घूमता था,
आज वही पिता बनकर
हर कदम सोचकर चलता है।

वह हँसता है बच्चों के लिए,
छिपा लेता है अपना दर्द,
क्योंकि पिता होने के बाद
ख़ुद से पहले
बच्चों का ख़याल आता है।

शायद पिता होना
सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं,
हर दिन ख़ुद को थोड़ा-थोड़ा
बच्चों के नाम कर देना है।

और एक दिन
जब बच्चे बड़े हो जाते हैं,
तो पिता की वही पुरानी आँखें
चुपचाप बस इतना कहती हैं—
मेरे हिस्से की ख़ुशियाँ
तुम्हारे हिस्से में आ जाएँ,
बस यही मेरी सबसे बड़ी
ख़्वाहिश है।
- दुर्गेश जायसवाल 'चमन' 
2 महीने पहले
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