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"कर्ज़"

DrPradeep Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कर्ज लेकर जी लेना, इतना आसान नहीं,
        
                                                    
                            
फर्ज पूरा कर लेना, इतना आसान नहीं।
जुआ खेल पांडव फँस गए थे कर्ज चुकाने के चक्कर में,
पता था उन्हें पर दाँव लगा दी पाँचाली, सब कुछ पाने के चक्कर में।
एक बार फिर मैं मन को समझाता हूँ,
कर्ज चुकाने की चाहत में,फिर से दाँव लगाता हूँ।
कर्ज लेकर “घी” पी लेना, इतना आसान नहीं,
सिर पर कर्ज का बोझ लेकर जी लेना, इतना आसान नहीं।
माचिस जैसा घर हो, ऊँची इमारत में,
डर लगता है,कर्ज की किस्तें चुकाने में।
रोज़ चढ़ूँगा सीढ़ियाँ, कर्ज का बोझ लेकर ,
डर यह सताने लगता है।
ऐसे में अब तो ब्याज भी,शत्रु-सा नज़र आने लगता है,
हर महीने किस्त का बोझ, मन को और भी सताने लगता है।
किस्तों में डूब न जाए, ज़िंदगी की ये किश्ती,
सुख पाने की चाहत में, क्यों बना दे शमशान बस्ती?
कर्ज लेकर जी लेना—इतना आसान नहीं,
फर्ज निभाकर जी लेना—इतना आसान नहीं।
मेहनत से कमाई ,पिता की जो भी जायज़ाद थी,
बड़ा बनने के लालच में,दाँव लगा दी जो बुनियाद थी।
सब कुछ पाने की चाहत में, सबको दाँव लगाता हूँ,
सब कुछ खोने के बाद, मन ही मन चुप रह जाता हूँ।
खर्चीली शादी करके,जो कर्ज़दार हो जाते है,
कर्ज चुकाने के चक्कर में, निज रिश्तेदार गवाते है।
कभी हालात का हवाला दे,कभी किस्मत को दोष लगाते हैं,
अपनी ही भूलों के आगे, बहाने जाने कितने वो बनाते हैं।
न जाने कितने जतन किए, जो खोया उसे पाने में,
मंदिर-मस्जिद दौड़ पडे वो, मन की शांति पाने में।
ढोंगियों की इबादत की, पर मन को चैन न आया,
जो कुछ पास बचा था,धीरे-धीरे उसे गवाया।
वक़्त गुजरता गया,वक़्त को दोष देते गए
कर्ज चुकाते-चुकाते , जीवन को यूं ही ढोते गए
कर्ज लेकर जी लेना—इतना आसान नहीं,
फर्ज पूरा कर लेना—इतना आसान नहीं।
चादर जितनी हो उतने ही, पैर पसारना सीखो,
कर्ज की चमक से बचकर, सुख से जीवन जीना सीखो।

- डा.प्रदीप बाबू
देहरादून (उत्तराखंड)
6 घंटे पहले
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