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अब तो बस्स आज़ाद होना चाहता हूँ।।

Dr. Siddharth

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            थक गया मैं करते करते याद तुझको,
        
                                                    
                            
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ।

ले चली जा इन यादों को भी साथ अपने,
संग दरिया मैं भी बहना चाहता हूँ।।

दिन उजाले मे ढल जाते है यूँ ही,
रात भी मैं गुनगुनाना चाहता हूँ।

रख दिया जब राज़ सारे खोलकर तुमने,
तो भूलना भी सिखना मैं चाहता हूँ ।।

पास रहकर भी रहे जो फासले यूँही,
अब उन दूरियों को मिटाना चाहता हूँ।।

खामोशियों का बोझ अब उठता नहीं मुझसे,
महफ़िल में लौटकर मुस्कुराना चाहता हूँ।।

थक गया मैं करते करते याद तुझको,
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ।।

बहुत इम्तेहा ले लिया जिन्दगी तुने,
अब तो बस्स आज़ाद होना चाहता हूँ।।
-सिद्धार्थ बरनवाल 
एक महीने पहले
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