स्नेह-हृदय थे पिता हमारे, मन से निष्छल-पावन,
किंतु ताऊ-चाचा ने घोला, विष से भरा रसायन।
"पुत्र ही तरणि, पुत्र ही तारण"—यह कुचक्र फैलाया,
सीधे-साधे जनक के मन को, छल से दूषित काया।
वंश-दीप के मिथ्या मद में, अधिकारों को बाँटा,
भगिनी के कोमल हिय में, बोया तृष्णा का काँटा।
स्नेह-सूत्र राखी का पावन, ईर्ष्या से झुलस गया,
तात हमारे मौन रहे, और भ्राता मद में सध गया।
काल-चक्र ने जब गर्जन कर, घोर विपत्ति ढाली,
प्राण-प्रिय उस कुल-दीपक ने, अपनी बांहें खाली।
हादसे की अति-भीषण ज्वाला, या फिर स्वार्थ-प्रवास,
मद में डूबा पुत्र बहा गया, पिता का अंतिम सांस।
तब वो कान-भरावक कुनबा, दूर खड़ा मुस्काया,
जिस चाचा ने आग लगाई, वही तमाशा लाया।
जिस बेटी को 'परया धन' कह, तिनके-सा ठुकराया,
वही भवानी बनी ढाल, जब संकट भीषण आया।
पूछो उन कुल-घाती वृद्धों से, जो बनते धर्म-ध्वज,
क्या जामाता (दामाद) पर भी चलता, इनका मिथ्या गर्ज?
वहां तो मस्तक अवनत होता, नयन झुकाने पड़ते,
फिर निज कन्या के अधिकारों पर, क्यों ये गिद्ध मँडराते?
ऐसे विषधर रिश्तेदारों का, सामाजिक बहिष्कार करो,
तात-सुता के पावन पथ से, यह पाखंड दरकिनार करो!
भ्राता-भगिनी के पावन प्रेम में, मत बोओ यह खार,
सत्य वही, जो निष्कपट दे, बेटी को अधिकार!