तुम्हें तकलीफ तो होगी
मुझे छोड़कर जाने में,
क्योंकि तुम इतने बुरे भी नहीं...
पर वो वादा भी तो अब तुम्हें निभाना है
जो तुम कर चुके हो किसी और से।
मेरे पास तुम्हें देने को
अब बस एक मुकम्मल मुक्ति है,
बाकी हिस्सों से मैं बिल्कुल खाली हो चुकी हूँ—
ना कोई क्रोध, ना पछतावा, ना मलाल,
बस एक ठहरी हुई शून्यता है
जो बार-बार तुमसे कह रही है:
जाओ, अपना वादा निभाओ।
तुम्हारे धोखे ने मुझे कठोर बना दिया है,
मेरी इतनी सी भी फिक्र न करो...
मैं जी लूंगी।
बहुत कुछ अब खुद के दम पर कर लेती हूँ,
भले ही खुशी से नहीं,
पर उस बेचारी से बहुत बेहतर हूँ
जिसे तुमने अपने भ्रमजाल में फंसा रखा है।
स्वाभिमानी, स्वाभिमानी,
और सिर्फ स्वाभिमानी हो गई हूँ मैं—
न कमज़ोर, न लाचार, न बेसहारा, न बेचारी।
पहले ज़रूर सोचती थी बहुत कुछ,
पर वो तो सिर्फ मेरी भोली सोच थी न?
संघर्षों में अकेले रहते-रहते जाना
कि मैं तो कागज़ नहीं, बहुत मज़बूत हूँ।
घबराए हुए तो तुम दोनों लगते हो मुझे,
और मुझसे डरते भी हो...
पर अब बहुत हुआ ये चूहे-बिल्ली का खेल!
आज़ाद करती हूँ तुम दोनों चूहों को,
पर एक सख़्त चेतावनी के साथ—
कि मुझ बिल्ली को अपना हितैषी या दोस्त समझकर,
या मुझ पर कोई दया करके,
दोबारा मेरे सामने आ मत बैठना।
वक्त गवाह है, चूहा-बिल्ली कभी दोस्त नहीं हुए,
और अगर बिल्ली संत भी हो जाए,
तो भी भला वह अपनी संतई से
चूहे की फितरत थोड़ी बदल सकती है!
मज़बूत दिखना एक ज़रूरत है उन लोगों के लिए
जो कंधों के बोझ से ज़्यादा
दिल के दर्द और आँखों के आंसुओं से लाद दिए जाते हैं।
पर अब सबके लिए,
मैं तुम्हारे इस जीवन पर एक विराम थमाती हूँ।
अब तुम दो प्राणी नहीं—
सिर्फ तुम और तुम्हारी चुहिया।
आपस में कंट्रोल रूम और एक-दूजे का रिमोट कंट्रोल बनो,
मैंने अपना रिमोट तो अपने पास सुरक्षित रख लिया है।
तुम्हारी उंगलियां मचलेगी बहुत,
पर माफ़ करना...
तुम्हें पुरानी आदत छोड़ने में थोड़ी तकलीफ भी ज़रूर होगी,
जिसका मुझे बेहद खेद है।
पर साथ ही... एक चीज़ और चुराई है मैंने जाने से पहले,
तुम्हारे साथ बिताए हर लम्हे की कड़वी-मीठी याद!
घर का हर कोना घिस-घिस के मैंने साफ़ कर दिया है
तुम दोनों के नए स्वागत में।
दीवारों से अब मेरी कोई खुशबू नहीं आती,
हाँ, थोड़ी सीलन ज़रूर रह गई है,
शायद अब उसी की महक है पूरे घर में।
वो 'चुहिया' अगरबत्ती जलाना तो जानती होगी,
तो उससे बेहतर महक तो ज़रूर होगी तुम दोनों के पास।
कभी रुक कर देखना और सोचना इस घर में,
क्योंकि इससे पहले तो कभी
तुम मेरे पास चैन से इस घर में रुकते नहीं थे।
मैं चली...
पर हाथ जोड़कर एक विनती है—
हमारी इन खुशियों की तस्दीक करने
कभी लौटकर मत आना,
क्योंकि अब मैं और कोई पीड़ा नहीं सह पाऊँगी,
और उस पीड़ा में तुम्हें भी अब और नहीं देख पाऊँगी।
गलतफहमी थी मुझे कभी कि तुम्हें मेरी आह से दर्द होता है,
पर अब समझ आया कि
तकलीफ तुम्हें मेरी आह से नहीं,
मेरे रोशन चेहरे की मुस्कान से होती थी!
पहले सोचा, जाते-जाते तुम्हें बता दूँ
कि तुम अपनी इस फितरत की बीमारी का इलाज करवा लेना,
पर फिर ख्याल आया कि
अब यह हक़ तो सिर्फ उस चुहिया का है।
मैं तो आज़ाद हूँ।
म्याऊँ... म्याऊँ।