मैं घंटों दीवारें ताकता हूं
मेरे खयाल दीवारों से टकरा कर
अलग अलग दिशाओं में तितर बितर जातें है
कुछ मेरी दिशा में वापस लौटकर आते हैं
पर मेरा अंतर्मन उन्हें वापस जगह नहीं देता
मेरे कहने पर भी नहीं
मुझे दया आ जाती है
और उन्हें पन्नों में उतार देता हूं
डायरी बंद करता हूं
और भूल जाता हूं
पौधों को पानी देता हूं
और भूल जाता हूं
कुत्ते को खाना देता हूं
और भूल जाता हूं
जिसे नहीं भूलता
जरूरत पड़ने पर वो मुझे भूल जाते हैं
हम सब एक छत के नीचे रहते हैं
डायरी के खयाल,
गमले में पौधे
और काले बालों वाला कुत्ता
कोई हमें छोड़ गया है
कोई हमें भूल गया है
किसी ने हमें वापस नहीं लिया
किसी की दया का हमें इंतजार है
ये एक रिफ्यूजी कैंप है ।
- धनराज
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