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पहिले चौपाला लागै, किस्सा-कहानी होवै,

Dev Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पहिले जैसन गाँव नाहीं बाटै,
        
                                                    
                            
बदलि गवा अब सारा ठाट-बाट है।

पहिले बखरी कच्ची, मनवा सच्चा रहा,
एक दुअरिया रोवै, पूरा गाँव इकट्ठा रहा।
चूल्हा एक जरे, धुआँ सबका लागै,
एक के पीर मा, दुसर का जियरा जागै।

अब पक्की अटारी, ऊँची दीवार भई,
दीवारन के संगै, मनवौ मा दरार भई।
सड़क तौ आ गयी, बिजली तौ आ गयी,
पर मन के भीतर के, बतिया अँधियार भई।

पहिले चौपाला लागै, किस्सा-कहानी होवै,
बूढ़-पुरनिया बोलैं, सबका मन मोहै।
अब हर हाथे मिरचा-सा मोबाइल बाजै,
पास बैठा मनई, दूर-दूर लागै।

खेती-बारी छोड़ि, लरिका शहर भागैं,
बाबू के कंधा पर, बरिसन का भार लागै।
ट्रैक्टर से खेत जोताय, खुशी तौ मनावैं,
पर माटी के महक से, रिश्ता छूटि जाय।

बदलाव बुरी बात नाहीं, भइया यह जानौ,
पर जड़ से जो टूटि गवा, ओका पहचानौ।
स्कूल-हस्पताल बनै, यह तौ बहुतै नीका,
पर साथै मा बनै रहै, मनई से मनई का लीका।
एक घंटा पहले
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