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त्याग की लत..

Deepak Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            त्याग की लत
        
                                                    
                            

कभी फ़क़ीर, कभी शाह,
कभी दिलनशीं की तरह—
ज़िंदगी रोज़ मिलती है हमसे,
किसी अजनबी की तरह।

कभी चेहरे बदलती है,
कभी किरदार बदलती है,
और कभी अपने ही लोगों में
अपनापन तलाशती है।

मैं मोह का आदी नहीं हूँ,
मुझे रिश्तों को बाँधना नहीं आता…
जिसे अपना मान लिया,
उसके लिए ख़ुद को मिटाना आता है।

हाँ,
मेरे त्याग की लत बहुत बुरी है…

मैंने कई बार
अपनी ख़ुशी छोड़कर
किसी और की मुस्कान चुनी है,
अपने हिस्से का सुकून छोड़कर
किसी और को चैन दिया है।

मगर अब समझा हूँ—
त्याग वही खूबसूरत है
जिसमें अहंकार न हो,
और इंसानियत वही सच्ची है
जिसमें एहसान न हो।

ज़िंदगी में
फ़क़ीर बनो या शाह—
बस इतना याद रखना…

किसी की मजबूरी पर मत हँसना,
किसी के दर्द को तमाशा मत बनाना,
और किसी के टूटे हुए दिल पर
अपनी जीत का महल मत बनाना।

क्योंकि वक़्त सबका हिसाब रखता है…

आज तुम किसी के लिए
अजनबी हो सकते हो,
कल वही अजनबी
तुम्हारी ज़िंदगी की
सबसे बड़ी दुआ बन सकता है।

इसलिए मोह कम रखो,
मगर इंसानियत बेहिसाब रखो…

क्योंकि रिश्ते बदल सकते हैं,
हालात बदल सकते हैं,
ज़िंदगी बदल सकती है—
मगर तुम्हारे भीतर का इंसान
कभी नहीं बदलना चाहिए।


 
47 मिनट पहले
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