यौवन की समिधा दे जिनने, तप्त किया माटी का भाल,
जिनकी धधक देख कर काँपा, क्रूर मृत्यु का दर्प कराल।
जिनकी भस्म-धूलि से उठकर, जागा यह सोया भूगोल,
अम्बर! आज गरज कर तू भी, उन वीरों की जय-जय बोल।
जिनकी मौन हुंकारें सुनकर, दरक गए सदियों के तम,
जिनके तने भाल से टकरा, लौट गया था वापस यम।
जिनके अस्थि-नाद ने पल में, दिए लौह के बंधन खोल,
अम्बर! आज गरज कर तू भी, उन वीरों की जय-जय बोल।
नग्न वक्ष पर जिनने झेले, क्रूर दमन के वज्र-प्रहार,
टूट गईं शमशीरें लेकिन, थमा न उनके मन का ज्वार।
जिनके तप्त लहू की बूँदें, बजा गईं प्रलयंकर ढोल,
अम्बर! आज गरज कर तू भी, उन वीरों की जय-जय बोल।
जिनके चिता-भस्म को छूकर, हुई पवन भी आज पुनीत,
गाते हैं नभ के ग्रह-तारे, जिनके मौन दहन के गीत।
जिनकी राख उगलती अब भी, स्वाभिमान की अग्नि अतोल,
अम्बर! आज गरज कर तू भी, उन वीरों की जय-जय बोल।
-दीपक कुमार मिश्र