अग्नि से जो जन्मी थी, मैं वो ज्वाला रूप है,
न कोई साधारण नारी, मैं प्रचंड धूप है,
यज्ञकुंड से उठी थी, इतिहास ये गवाह है,
सत्य की तलाश में ही मेरी हर एक राह है।
धर्मराज की चाल में,जब दांव पर लगाई गई,
अपनों के ही बीच में ,मैं यो पराई हुई ,
खींच रहा था चीर मेरा, जब वो दुशासन क्रूर,
पांडवों की आँखे थी, झुकी और निगाहें थी दूर।
भीष्म भी थे मौन बैठे, द्रोण की थी लाचारी,
सभा में बैठी हर एक मूरत थी बेचारी,
तब पुकारा मैंने कान्हा,सांवरिया सरकार को,
बचाने आ गए वो तो मेरी लाज पतार को।
बढ़ता गया चीर वैसे, बढ़ा मेरा विश्वास था,
अधर्म के उस मेले में, कृष्ण ही प्रकाश था,
खुले हुए ये केश मेरे, मेरी वो प्रतिज्ञा थी,
कुरुक्षेत्र की भूमि पर लिखी एक संख्या थी
मैं केवल कहानी नहीं, एक नया विधान हूँ,
हर युग की पीड़ित नारी का ,मैं तो स्वाभिमान हूँ,
मत समझों तुम मुझको अबला,अग्नि की सुता हूँ मैं,
इतिहास के पन्नों में डूबी एक कथा हूँ मैं।