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एक याद

Bobby Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ यादें आज भी पड़ी हैं
        
                                                    
                            
दिल की तलहटी में गुमनाम सी
जो कभी शोर भी करती हैं
कभी दिखावा भी
ये सोच कर अफ़सोस भी
होता है और कभी पछतावा भी
यादें जो कभी ऊपरी सतह पर थी
और जवान भी थी
वो अब बूढ़ी हो चुकीं है
और बेजान भी
वो बात आज भी करतीं हैं
पर जिद्द नहीं करती
किसी स्वरूप में ढल जाने की
वो अब खरी हो चुकीं हैं सोने सी
बलिष्ठ आकार था जिनका वो
अब हो चुकीं हैं बौने सी
वो शायद सच का सामना कर चुकीं हैं
तभी तो लगता है वो अब सुधर चुकीं हैं
मेरी यादें....


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6 वर्ष पहले
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