रात की चौखट पर
रात की चौखट पर
जब कुछ आहट सी होती है
मेरी गहरी नींद टूट जाती है
और मैं जग जाता हूँ
आहट का पीछा करता हूँ
और खोजता हूँ तुझे मैं
पर तू नज़र नहीं आती
ये हर रोज़ का क़िस्सा है
क्या तू अब भी मेरे जीवन का हिस्सा है
पर एक बात का पता नहीं
ये आवाज़ कहाँ से आती है
खोजता हूँ तुझे पर तू कहीं
नहीं नज़र आती है
फिर सोचता हूँ तू रहती कहाँ है
क्या मेरे दिल के कमरे में
मेरे मन के पिंजरे में
क्या तू आज़ाद होना चाहती है
जो हर रात आवाज़ लगती है
चीख़ती है चिल्लाती है
पर नज़र नहीं आती कभी
माना मेरी सहेली है तू
पर अब एक अनसुलझी पहेली है तू।
-जितेंद्र कुमार
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