ये ज़िन्दगी के कष्टों को यूँ तोड़ व मरोड़कर
यह ज़िंदगी की कीमत को मैं अब जो मोलकर
समझने लगा हूँ निखरने लगा हूँ
बरस-सा गया बस बरसने लगा हूँ
सावन की काली घटा में कली-सा
मायूस ही था इंतज़ार में हमेशा
होगा उज्यारा छटेगी घटा ये
सूर्य-किरण में ये चमकेगी माया
चाहत ये थी पुरे सावन में मेरी
सूर्य का दामन व ग्रीष्म की छाया
कालगति-संग प्रभाकर भी बरसे
छायी जो धुप दिल-हमरा भी हर्षाया
खेल था ये कुछ दिनों का तुम समझो
ग्रीष्म तो मानो अंगारे ले आया
मन ये न भावे दिवाकर की आभा
रवि की छाया में अब जो ख्याल आया
बारिश का पानी वो सावन की काया
सोचा ये था मैंने जो कभी ना
मन ये न बस्ता कभी भी कही न
मन ये जो माने पत्थर को मनोहर
हीरा वो जैसे देखा हो कभी न
अब जो मैं ये समझने लगा हूँ
बरस-सा गया बस बरसने लगा हू
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