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सांझ गांव की

Bijenderaakash

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जीवन की इस भागदौड़ से
        
                                                    
                            
थक जाते हैं जब बहुतेरे*
वही सुरमई* सांझ गाँव की
उतरे मन आंगन में मेरे

सुर्ख मुलायम बादल के दल
प्रतीची* पर फैला मखमल
दूर क्षितिज लगता है ऐसे
नील सरोवर में ज्यों शतदल*
अमराई* में मोर बोलता
लगे हृदय में सुर के डेरे
वही सुरमई सांझ गाँव की
उतरे मन आंगन में मेरे

खग स्वर से सब नीड़ सजे हैं
शिवालयों में शंख बजे हैं
गोधूलि का चंदन उड़कर
धरती पर नव मेघ बने हैं
ग्वाल-गडरिये लौटे घर को
हो गये रोशन रैन बसेरे
वही सुरमई सांझ गाँव की
उतरे मन आंगन में मेरे

खेतों में है शांत सी रौनक
घर की तैयारी में कृषक
बैठ मेड़ पर चिलम खींचता
साथ में है खेतों का रक्षक*
चंदा भी तो आ पहुंचा है
हरने भावी सघन अंधेरे
वही सुरमई सांझ गाँव की
उतरे मन आंगन में मेरे

चूल्हों से वो उठता धूंआ
प्यारा पनघट मीठा कूंआ
चौपालों में बैठ के हंसते
खिल जाता था रूआं रूआं
नहीं भूलती आपस दारी
प्रीत प्रेम और स्नेह घनेरे
वही सुरमई सांझ गाँव की
उतरे मन आंगन में मेरे

माँ का दस्तरखान* याद है
हरेक स्वाद उसके बाद है
जो रोटी संग प्यार परोसा
बिन उसके सब बेस्वाद है
हैं अब भी मां जहन में अंकित,
स्नेह चित्र तेरे- उकेरे
वही सुरमई सांझ गाँव की
उतरे मन- आंगन में मेरे

वह छत पर के बिस्तर चद्दर
शीतलता कुछ ख़ास थी उन पर
दादी मां की किस्सागोई
था उसमें भी जंतर मंतर
नींद चैन की सो जाते थे
सीधे दिखते अलस सवेरे
वही सुरमई सांझ गाँव की
उतरे मन आंगन में मेरे

जीवन की इस भागदौड़ से
थक जाते हैं जब बहुतेरे
वही सुरमई सांझ गाँव की
उतरे मन- आंगन में मेरे
-बिजेंद्र भारद्वाज "आकाश"
एक वर्ष पहले
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