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दानवीर कर्ण की वीरता

Bhavik Jain

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            महाभारत का योद्धा मैं था विकट,
        
                                                    
                            
अर्जुन था काल के निकट।
था अटल मेरा सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनने का प्रण,
हां मैं वहीं हूं सूर्यपुत्र दानवीर कर्ण।

था मुझे जन्म से कवच कुंडल का वरदान,
कर दिए इंद्र को यह सब दान।
विद्या को मैने गुरु परशुराम से मांग लिया,
ज्ञान देकर भी मुझ से छीन लिया।

अर्जुन के समक्ष में कुरुक्षेत्र के मैदान पर खड़ा रहा ,
मैं दुर्योधन के प्रति अपने प्रण पर अड़ा रहा।
था मैने थामा विजय धनुष को हाथ में,
लेके अर्जुन आया वासुदेव को साथ में।

अंत समय में मैं विद्या को भूल गया,
रथ के पहिए को पृथ्वी ने जकड़ लिया।
वासुदेव के एक इशारे में बाण था चला दिया,
काल ने था मुझ को जकड़ लिया।

महाभारत के मैदान में,
एक योद्धा ने अंतिम साँस ली।
कर्ण, जिसका धनुष कभी नहीं हारा,
अब धरती पर गिरकर सो गया।

उसकी वीरता की कहानी सुनाई जाएगी,
उसके बलिदान को कभी भुलाया नहीं जाएगा।
एक योद्धा की मृत्यु, एक युग का अंत,
कर्ण की यादें सदैव रहेंगी जीवंत।
एक वर्ष पहले
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