मतलब से जो गाई जाए
वो नज़्म नहीं होना मुझको
जो शहर शहर बुलाई जाए
वो बज़्म नहीं होना मुझको
मुझको बाबा बस इक रस्म बना देना
चढ़ती है तुझपर वो भस्म बना देना।।
वो फूल नहीं होना मुझको
जो सुबह चढ़े और शाम उठे
वो धूल नहीं होना मुझको
जो आंधी के साथ उठे
इस दुर्गंध को आंगन में अपने
बनाकर सुगंध उड़ा देना
मुझको बाबा बस इक रस्म बना देना
चढ़ती है तुझपर वो भस्म बना देना।।