दिल तोड जाओगे, ज्यादा ही क्या
तुम मुझे छोड़ जाओगे, ज्यादा ही क्या
लेतो न जाओगे मेरी आत्मा को प्रिये
भटकता छोड़ जाओगे, ज्यादा ही क्या।।
जैसे भटके प्रभू सिया के लिए
मैं भी भटकूंगा प्रिये तुम्हारे लिए
वन, बाग उपवन से पूछूंगा मैं
नदी, पहाड़, झरनों से पूछूंगा मैं
पशु, पक्षी , आसमान अगर बता न सके
तुम्हारा पता हम लगा न सके
फिर पूछूंगा मैं मन के हनुमान से
फिर मिलाएंगे वो आत्मा की राम से
मन के थे तुम मन में ही रहे
तन से दूर जाओगे, ज्यादा ही क्या।।