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दीप- दीप्ति

Ashutosh Goutam

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कहाँ से आत्मा आई, कहाँ ले जाएगा?
        
                                                    
                            
समय मौन साक्षी खड़ा, नहीं कुछ गाएगा।
अस्तित्व का गहन अर्थ, हृदय तक सिहरा,
निमिष-निमिष बीत रहा, क्षणों का पहरा।
विचार मन में जागते, कभी सूरज से तप्त,
कभी शीतल चन्द्र-सा, करे उर को आप्त।
उद्देश्य बिन जीवन व्यथा, विकल अन्तर-तार,
अरे सत्य, कब मिलेगा, बता दे उद्गार।
पर देखो, उसी व्यथा में, एक दीप जला,
प्रेम का वह अटल दीप, जिसने तम हर लिया।
प्रेम नदिया अविरल, हृदय-तट को भरता,
मृदुल रूप अनुराग का, सुमन-सौरभ जैसा।
पुलकित तन-मन बावरा, नयन चन्द्र-स वैसा,
वह स्पर्श मधुरस घुला, उर में बन अमर।
जगत सारा विस्मृत हुआ, रहा बस पल-भर,
सौन्दर्य-स्वरूप प्रेम का, कमल कोमलतम।
मिलन क्षण आनन्दमय, बना निमिष में परम,
किन्तु विधि का विधान क्या, प्रीति अधूरी रही।
कहाँ वह सुख, कहाँ वह चैन, कहाँ वह कहीं,
मन भ्रमित अथक भटकता, दिशा नहीं पहचाने।
प्रश्न-मेघ उर में घिरे, द्वन्द्व-जल बरसाने,
कौन पथ सच्चा यहाँ, कौन दिशा सुखदायी?
क्षण मिलन की चाह में, विरह-आँधी लहराई,
धड़कन बेचैन हुई, अन्तर में जलता दीप।
आशा का तृण जल गया, बुझा हुआ समीप,
विकल हृदय पुकारता, उत्तर नहीं कोई देता।
स्वप्न-मृग तृष्णा मिटा, रेत बनकर बहता,
हार मानी साध ने, ज्यों पतझड़-सा सूना।
आत्मबल का दीप बुझा, मन ने रोदन चुना,
वही पथ जो अपन था, अब कण्टक-किरणों से भरा।
खोया आत्म-विश्वास, जीवन नीरस हुआ,
हर प्रयास विफल बना, प्रेम भी निष्ठुर-सा।
नयन-नीरों से लिखी, उर-व्यथा की भाषा,
क्षण-क्षण सुलगती रही, अन्धियारों में चिता।
टूटा स्वप्न दे गया, करुण-रस की व्यथा,
किन्तु रुकना क्यों यहाँ, उठो रे साहसी मन!
आँसू पोंछो, चलो पुनः, रचो नया जीवन,
गिर-गिर उठना वीर का, अटल धर्म कहलाता।
अन्धकार से प्रकाश का, सुपथ सदा खिलाता,
मन में पुनः ज्योति जली, किया सङ्कल्प महा।
करूँ नया उद्घोष मैं, मिटे अन्तर-दाह,
विजयी निज कर्मों से, जगत को दिखलाऊँ।
जो टूटा था सपना, उसे अमर कर जाऊँ,
समय साक्षी बन रहा, मौन होकर देखे।
धीर वही जग जीतता, जो चलता ही रहे,
जीवन यह सङ्ग्राम है, नहीं मार्ग निरर्थक।
हृदय-वीणा झङ्कृत हुई, स्वर सच्चा क्षण-क्षण,
उठो, बढ़ो, लड़ो सदा, यही धर्म नर का।
सफल वही जो धैर्य से, सहे हर दुःख-भार का,
अन्त में यही सत्य है — जीवन निरन्तर।
प्रेम, वेदना और विजय — त्रिवेणी का अमर स्वर,
नहीं हार है अन्त, नहीं मृत्यु है अवसान।
जो सीखा, जो खोया — वही तो है जीवन-ज्ञान।
एक घंटा पहले
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