विज्ञापन

कोरोना से बच गए तो, जीवन निहाल है

Ashok Bajaj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यह कोरोना काल है, दुनिया में भूचाल है,
        
                                                    
                            
घर से बाहर ना निकलें, जी का जंजाल है।

पर किसने किसकी मानी है, घर में रहने की ठानी है,
जब फैल गया कोरोना तो, हर बस्ती में वीरानी है।

चारों ओर हाहाकार है, मरीजों की चीत्कार है,
दवा नहीं बनेगी, तब तक डॉक्टर भी लाचार है।

सूना सूना बाज़ार है, ऑनलाइन व्यापार है,
काम-धंधा कब करें, चिंतित हर परिवार है।

टूट रहे अरमान हैं, बिदक रहे मेहमान हैं,
लग जाये यदि रोग तो, मर कर भी अपमान है।

मंदिर में बंद भगवान हैं, भटक रहे जजमान हैं,
त्योहारों के मौसम में, ना राशन ना पकवान है।

फ़ेस मास्क जरूरी है, रखना दो गज की दूरी है,
कितने भी हों काम पड़े, घर पर रहना मजबूरी है।

जिंदगी बेहाल है, बहुत बुरा हाल है,
कोरोना से बच गए तो जीवन निहाल है।

ऊपर वाले से गुहार है, सुखी रहे संसार है,
हाथ जोड़ विनती करे, बजाज बारम्बार है।

- अशोक बजाज रायपुर

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Ramesh Raj

25 कविताएं

View Profile

Junaid Ahmad

5 कविताएं

View Profile

Sooba Lal

1 कविता

View Profile

nutan Kumari

14 कविताएं

View Profile