हे माँ तुम ना अश्रु बहाना ,
खूब सजाना पाती दीपों की,
अपने रोते मन को समझाना,
दीप जलें तो लौ में नित क्षण,
मेरे हँसते सपनों को ही पाना,
पर हे माँ तुम ना अश्रु बहाना।
बिखरी है हर पग पर हर पथ ,
राख उड़ी तो अंतिम मेरी,
विजय पताका फहराएगी,
मेरी अंतिम श्वांस की भेरी,
दर्द छिटक कर जो आ जाए,
उसको पल में दूर हटाना,
आंखे कितना भी कोसें तुमको,
पर हे माँ तुम ना अश्रु बहाना।
-आशीष त्रिवेदी , गुरुग्राम
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