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मन के साथ संवाद

Ashish Trivedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं उन्मुक्त गगन में उड़ने की ,
        
                                                    
                            
तू क्यूं अभिलाषा करता है,
तू पगला है ओ मेरे मन,
क्यूं क्षणिक सी आशा भरता है ।

उस एक गगन जैसा है तन,
खुद उजला है तेरा भी मन,
फिर मन के भीतर का मन
क्या तुम को प्रेरित करता है ।

उन्मुक्त गगन में उड़ने की..
मन जैसा हूँ मन हूँ मैं मानव का,
अभिलाषा ही तो जीवन है,
बिन पंख लिये ही उड़ता हूँ,
ये सृष्टि मेरा आँगन है ।

जो मैनें उड़ना त्याग दिया ,
एक पल ,दो पल का हो जायेगा
जीवन का अगणित विस्तार कहीं ,
बस निपट अधेंरे खो जायेगा ।

मैं तेरे उड़ने की अभिलाषा से,
मानव स्वप्नों को बुनता है,
यदि धूल-धूसरित हो कुछ भी,
फिर क्यूं पथ के काँटें चुनता है ।

मन स्वप्न सदा होगा अविजित ,
मानव में ये भ्रम क्यूं आता है,
जब निहित पराजय में जय हो,
तब ही विजयी कहलाता है ।

मेरे हाथों की ओट लिए ,
तुम सदा स्वप्न को पाओगे,
कैसा हो पल बस मुस्काना ,
तुम उस को सच में लाओगे ।

उन्मुक्त गगन है घर मेरा,
स्वप्नों से जुड़ते जाना है,
मत रोको मुझको सुन लो,
बस हर पल उड़ते जाना है.....


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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